प्रशासनलखीमपुर खीरी

सरकारी तालाब पर कब्जा, प्रशासन खामोश! सीमांकन के बाद भी क्यों रुक गई खुदाई, किसे बचाया जा रहा है?

पोकलैंड पहुंची, कार्रवाई शुरू हुई, फिर अचानक सब कुछ थम गया... क्या तालाब बचाने की मुहिम पर भारी पड़ गया दबंगों का दबाव?

लखीमपुर खीरी के कस्बा खीरी में सरकारी तालाब को अतिक्रमण मुक्त कराने की कार्रवाई शुरू होते ही उम्मीद जगी थी कि वर्षों पुरानी जलभराव की समस्या का समाधान होगा। लेकिन सीमांकन में तालाब की जमीन पर बने पक्के मकान चिह्नित होने के बावजूद न नोटिस जारी हुई और न ही खुदाई आगे बढ़ी। अब सवाल उठ रहा है कि आखिर प्रशासन की कार्रवाई पर ब्रेक किसने लगाया?

लखीमपुर खीरी जिले के कस्बा खीरी स्थित मोहल्ला पट्टी रामदास का सरकारी तालाब एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है। तालाब को उसके मूल स्वरूप में वापस लाने के लिए प्रशासन ने सीमांकन की प्रक्रिया शुरू कराई, अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर पैमाइश कराई, तालाब की भूमि पर अतिक्रमण की पुष्टि भी हुई और खुदाई के लिए मशीनें भी पहुंच गईं। लेकिन इसके बाद जो हुआ उसने पूरी कार्रवाई पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि सरकारी तालाब पर वर्षों से कब्जा किए बैठे लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय प्रशासन अब मामले को ठंडे बस्ते में डालता नजर आ रहा है। यही कारण है कि तालाब की खुदाई शुरू होने से पहले ही रुक गई और लोगों की उम्मीदों पर पानी फिर गया।


दरअसल, कुछ दिन पहले एसडीएम अश्विनी सिंह, नायब तहसीलदार और नगर पंचायत अधिकारियों की मौजूदगी में तालाब का सीमांकन कराया गया था। सीमांकन के दौरान आधा दर्जन से अधिक पक्के मकान तालाब की भूमि की जद में पाए गए। प्रशासनिक कार्रवाई की शुरुआत के तौर पर जेसीबी से कुछ हिस्से में खुदाई भी कराई गई। इसके बाद लोगों को उम्मीद थी कि जल्द ही पूरे तालाब को अतिक्रमण मुक्त कराकर उसका पुनर्जीवन किया जाएगा।
लेकिन इसके उलट, खुदाई के लिए लाई गई पोकलैंड मशीन एक दिन तक मौके पर खड़ी रहने के बाद बिना कोई काम किए वापस लौट गई। इसके बाद न तो खुदाई शुरू हुई और न ही तालाब की भूमि पर कब्जा करने वालों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई दिखाई दी।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रशासन और नगर पंचायत के बीच जिम्मेदारी तय न होने के कारण पूरा मामला अटक गया है। वहीं कुछ लोग यह भी सवाल उठा रहे हैं कि क्या प्रभावशाली कब्जेदारों के दबाव में कार्रवाई को जानबूझकर धीमा कर दिया गया है।
सबसे बड़ा सवाल उन पक्के मकानों को लेकर है जो सीमांकन के दौरान तालाब की जमीन पर पाए गए थे। यदि प्रशासन की पैमाइश में अतिक्रमण की पुष्टि हो चुकी है तो फिर अब तक किसी भी कब्जेदार को नोटिस क्यों नहीं भेजी गई? आखिर किसके संरक्षण में सरकारी भूमि पर कब्जा बना हुआ है? इन सवालों का जवाब न तो राजस्व विभाग दे पा रहा है और न ही नगर पंचायत।
शनिवार को राजस्व विभाग की टीम एक बार फिर मौके पर पहुंची, लेकिन वहां खुदाई के लिए लाई गई पोकलैंड मशीन नहीं मिली। बाद में मशीन खराब होने की बात कही गई, लेकिन स्थानीय लोग इस दलील को मानने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि मशीन खराब होने की वजह से कुछ दिन की देरी हो सकती है, लेकिन पूरी कार्रवाई का रुक जाना कई बड़े सवाल खड़े करता है।
कस्बा खीरी के लोगों का कहना है कि तालाब केवल एक सरकारी भूमि नहीं है, बल्कि पूरे इलाके की जल निकासी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वर्षों से तालाब के पाटे जाने और अतिक्रमण बढ़ने के कारण बरसात में जलभराव की समस्या लगातार गंभीर होती गई है। कई मोहल्लों में लोगों के घरों तक पानी भर जाता है, जिससे जनजीवन प्रभावित होता है।
स्थानीय नागरिकों का मानना है कि यदि तालाब को उसके मूल स्वरूप में विकसित कर दिया जाए तो बरसात के दौरान होने वाले जलभराव की समस्या काफी हद तक कम हो सकती है। यही वजह थी कि जब प्रशासन ने सीमांकन कराया और खुदाई की तैयारी शुरू की तो लोगों को उम्मीद जगी थी कि वर्षों पुरानी समस्या का समाधान निकल सकता है।
लेकिन मानसून की दस्तक से ठीक पहले कार्रवाई का रुक जाना लोगों की चिंता बढ़ा रहा है। बरसात शुरू होने में अब ज्यादा समय नहीं बचा है और यदि समय रहते तालाब की खुदाई नहीं हुई तो एक बार फिर कस्बे के कई इलाके जलभराव की चपेट में आ सकते हैं।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि सरकारी भूमि पर कब्जा करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने की बजाय प्रशासनिक तंत्र चुप्पी साधे हुए है। यही कारण है कि अब लोगों की निगाहें जिला प्रशासन पर टिक गई हैं। कस्बा वासियों का कहना है कि जिलाधिकारी स्वयं मामले का संज्ञान लें और यह स्पष्ट करें कि तालाब की खुदाई आखिर रुकी क्यों है तथा जिन लोगों ने सरकारी तालाब की जमीन पर कब्जा किया है उनके खिलाफ कार्रवाई कब होगी।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन सरकारी तालाब को अतिक्रमण मुक्त कराकर उसका अस्तित्व बचा पाएगा या फिर दबंगों और विभागीय खींचतान के बीच यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा। फिलहाल कस्बे के लोगों को अपने सवालों का जवाब और तालाब को न्याय मिलने का इंतजार है।

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